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संयोगिता कौन थी || संयोगिता एक काल्पनिक किरदार ||संयोगिता Sanyogita prathviraj chouhan History

संयोगिता को तिलोत्तमा, कान्तिमती, संजुक्ता इत्यादि नामों से भी जाना जाते थे। उनके पिता कन्नौज के राजा जयचन्द थे और वो पृथ्वीराज तृतीय की पत्नी थी। पृथ्वीराज के साथ गान्धर्वविवाह कर के वें पृथ्वीराज की अर्धांगिनी बनी थी।

संयोगिता के बारे मे विभिन्न कवियों के भिन्न भिन्न विचार हैँ जो भिन्न भिन्न मिलते हैँ जिसमे पहला सन्दर्भ हम लेते हैँ पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि माने जाने वाले चंद्र बरदाई के लिखे ग्रन्थ पृथ्वीराज रासो काव्य से जिसके अनुसार


“संयोगिता स्वयंवर नाम के विभाग में उल्लिखित है कि, संयोगिता पूर्व जन्म में रम्भा नामक अप्सरा थी। कसी ऋषि के शाप के कारण वह संयोगिता के नाम से पृथ्वी पर अवतरित हुई” अन्य सन्दर्भ हम इतिहास से ही लेते हैँ जिसमे पृथ्वीराजविजय महाकाव्य में संयोगिता का नाम तिलोत्तमा और सुरजनचरितमहाकाव्य में कान्तिमती।
पृथ्वीराजरासो काव्य में और सुरजनचरित महाकाव्य में स्पष्टोल्लेख है कि, संयोगिता जयचन्द की पुत्री थी। पृथ्वीराजविजय महाकाव्य का महान् भाग क्षतियुक्त है। परन्तु वहाँ भी गंगा नदी के तट पर विकसित किसी ग्राम में संयोगिता का जन्म हुआ था!!

काफी ऐतिहासिक मत संयोगिता की प्रमाणिकता पर संसय प्रकट करते हैँ जिसमे कुछ कुछ विद्वानों का मत है कि,
“जयचन्द के शिलालेखों में कहीं भी संयोगिता का उल्लेख नहीं प्राप्त होता है। एवं उसके अस्तित्व के भी कोई प्रमाण न होने से वह एक काल्पनिक पात्र मानी जाती हैं”।

जो विद्वान् संयोगिता के ऐतिहासिक पात्र होने के विषय पर प्रश्नार्थचिह्न करते हैं, उनमें डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा की गणना होती है। डॉ ओझा का मत है कि, जयचन्द के शिलालेखों में या ताम्रपत्रों में कहीं भी संयोगिता का वर्णन नहीं है और रम्भामंजरीमहाकाव्य में और हम्मीरमहाकाव्य में संयोगिता का उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। अतः सोलहवीं शतब्दी के किसी भाट की कल्पना थी संयोगिता का पात्र है
ऐतिहासिकता के हिसाब से अगर मिलान किया जाए तो वो भाट क़ोई और नहीं चंद्र बरदाई ही है यही बो लेखक था जिसने सबसे पहले अपने दिमाग से संयोगिता नाम का एक किरदार को जन्म दिया था और पृथ्वीराज चौहान जैसे वीर योद्धा के माथे पर एक कलंक लगवा दिया की संयोगिता के प्रेम और भोग विलाश मे लिप्त होने के कारण ही पृथ्वीराज ने शाशन पर नजर नहीं रखी और विदेशी हमलावर गोरी सफल हुआ था अन्य इतिहासविदों का कथन है कि, रम्भामंजरीमहाकाव्य में और हम्मीरमहाकाव्य में संयोगिता का वर्णन नहीं है ओझा-महोदय ने यही तर्क दिया है परन्तु उन ग्रन्थों में पृथ्वीराज के विवाहों का उल्लेख ही नहीं है। जिससे पृथ्वीराज के विवाह नहीं हुए हैँ अतः ये कहना मुश्किल है की संयोगिता नाम की क़ोई रानी है भी या नहीं है

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