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पृथ्वीराज चौहान के इतिहास मे इतिहास कम मिथक ज्यादा है!!

पृथ्वीराज चौहान parthviraj chauhan के इतिहास मे सच और झुंट मे लिपटे हज़ारो ऐसे अन कहे मिथक जुड़े हैँ जिनका इतिहास और सत्यता से दूर दूर तक क़ोई लेना देना नहीं है इस पोस्ट मे हम उसी इतिहास से जुड़े हुए सारे मिथक और कहानियो पर चर्चा करने वाले हैँ1:-पृथ्वीराज चौहान के इतिहास history of parthviraj chauhan को लेके सबसे बड़ा मिथक है उसमे ये है की इनको अंतिम हिन्दू राजा घोषित करने की किंवायत जोर शोर से एक जातिय वर्ग के द्वारा चलाई गयी जिसमे उस जाती के इतिहासकारो ने पूर्ण योगदान भी दिया मगर बो दूर दूर तक उसमे सफल नहीं हुए क्यों की पृथ्वीराज चौहान के बाद भी इतिहास मे महानतम राजा हुए जिनका साम्राज्य दूर दराज और सम्पूर्ण भारत पे फैला था जिनमे शिवाजी महाराज, कृष्ण देवराय, और सम्राट हेमू का योगदान सबसे महत्वपूर्ण है अगर यदि पृथ्वीराज चौहान अंतिम हिन्दू राजा थे तो फिर शिवाजी महाराज, हेमू और कृष्ण देवराय कौन थे?

2:-पृथ्वीराज चौहान parthviraj chauhan को लेके प्रस्तुत इतिहास जो ज्यादा तर मिथकीय ग्रंथो पे लिखा गया है जिसकी प्रस्तुति

पृथ्वीराज चौहान के समय के बाद के लेखकों ने की हैजैसे पृथ्वीराज के विवरण जिस ग्रंथ मे सर्वाधिक मिलता है बो है पृथ्वीराज राशो जो की एक गायन शैली मे लिखा गया भाट परंपरा पर आधारित ग्रंथ है जिसकी सत्यता पर हमेशा संदेह पाया गया है

A-संदेह का कारण है क्षत्रिय अग्निकुल वंश की उत्पति हवन से बताना, पृथ्वीराज रासो के अनुसार गुर्जर, चौहान, परमार,सोलंकी ये अग्नि कुंड से पैदा हुए हैँ जो ना तो सत्य है ना ही वैज्ञानिक सत्य हे, और नाहीं प्रामाणिक सत्य है यह कवि की महज एक कल्पना है जिसका क़ोई आधार ही नहीं हैB-आल्हा खंड का मौखिक इतिहास भी इस बात पर सवाल खडे कर देता है वज़ह उसकी काफी है जैसे आल्हा खंड के लेखक कवि जयाँनक हैँ जिन्होंने आल्हा उदल इंदल परमाल नरेश, इत्यादि के पृथ्वीराज से 18 युद्ध का विवरण किया जिसका सिर्फ मौखिक इतिहास मिलता है लिखित इतिहास कही भी नहीं मिलता है ये भी कवि जयानांक की. एक लोगों को और वर्षा ऋतू मे गाँव देहात के जन जीवन को गुजराने के लिये गड़ी गयी कहानी हैँ जिनका सत्य और प्रमाण से क़ोई लेना देना नहीं इन 18 युद्ध मे ही पृथ्वीराज चौहान की हार का विवरण किया गया है, अब इसको अतिश्योक्ति ना माने तो क्या माने की इस युद्ध का किसी भी अभिलेख मे क़ोई जिक्र नहीं मिलता है नाही किसी समकालीन किसी यात्री के यात्रा वृतांत मे विवरण मिलता है इस से आप अंदाजा ही लगा सकते हैँ की इतिहास को किस तरह से मिथक के रूप मे गढ़ दिया गया है

3- मिथकीय दोहा:-

A:-चार हाथ चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमान…!ता ऊपर सुल्तान है, अब न चूक चौहान..मोहम्मद गोरी जब पृथ्वीराज को 1192 मे तराईन के द्वातीय युद्ध मे पृथ्वीराज को बंदी बनाकर अफगान लेकिन जाते हे वहां लेजाकर पृथ्वीराज और कारागार मे रखते हैँ और उनकी आँखों को फोड़ देते हैँ उसके बाद गोरी उनको अपने भरे दरवार मे बुलाता है प्रस्तुति करता है जहाँ पर पृथ्वीराज का राजकवी चंद्र बर्दाई आकर उनसे बात करता है और उपर्युक्त दोहा का उच्चारण करता है जो की दोहे मे गोरी की स्थिती को बताते हैँ गोरी इस बात को सुनता है और चंद्र बर्दाई की तारीफ़ करता है, गोरी के मुँह से निकली हुयी तारीफ़ को सुन पृथ्वीराज शब्द भेदी बांड से गोरी को मार देता है असल मे यही इतिहास का सबसे बड़ा मिथक है जिसकी तुलना नहीं कर सकते हैँ नाम तो ही गोरी पृथ्वीराज को कभी भारत से बाहर लेकिन गया और नाही 1192 मे गोरी मारा गया है असल मे नातो कभी पृथ्वीराज ने क़ोई शब्द भेदी तीर चलाया और नाही बो कभी गोरी को लगा था गौरी की. मौत पृथ्वीराज चौहाँन के तीर छोड़ने के 14 साल बाद कुदरती मौत हुयी थी, अब ये कैसे मुमकिन हो गया की एक तीर 1192 मे छोड़ा गया और बो 1206 मे मरे गोरी मे लगा होगा

B:-a:-चार बांस, चैबीस गज, अंगुल अष्ठ प्रमाण।ता ऊपर सुल्तान है, चूके मत चौहान।।’’b:-चार हाथ चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमान…!ता ऊपर सुल्तान है, अब न चूक चौहान..ये वही दोहा है जिसको चंद्र बर्दाई ने गौरी के सामने बोला था और सुनके पृथ्वीराज ने तीर चलाया था खेर ये वही तीर है जो कभी गोरी तक पंहुचा ही नहीं है और तो और इस दोहे के सेकड़ो वेरियंट आपको क्षेत्र के अनुसार मिल जाएंगे कहीं पर चार बांस मिलेगा तो कही पर चार हाथ मिलेगा ऐसे ही अलग अलग आंकलन कराये गये हैँलेकिन इतिहास के रूप मे अगर देखते हैँ तो कहीं भी ये नहीं मिलता की हाथ और बांश एक बराबर होते हैँ तो फिर इस दोहे पर कैसे आँख बंध करके भरोसा कर लिया जाए

4:- अब तक हम सुनते आरहे थे की पृथ्वीराज चौहान एक राजपूत योद्धा थे लेकिन अब सुन ने मे आरहा है की पृथ्वीराज चौहान के गुर्जर योद्धा थे बो कुछ भी हों लेकिन हम जिंन प्रमानो पर बात कर रहे हैँ उनमे हैँ

1-अभिलेख

2-यात्रा वृतान्त

3-पांडूलिपि

4-ताम्र पत्र

5-दान पात्र

6-सिक्के ऐसे तथ्य जो उस समय ही लिखे गये हों या उसी राजा ने लिखबाए हों मगर ऐसा कहीं नहीं मिला की पृथ्वीराज चौहान को राजपूत लिखा हुआ क़ोई अभिलेख या ताम्र पत्र मिला हो या क़ोई सिक्का या यात्रा वृतान्त मिला होएक पुस्तक है प्राचीन पृथ्वीराज विजय महाकाव्य है जिसका लेखन उसी समय का है जब पृथ्वीराज चौहान का भारत के राजाओं से युद्ध हो रहाँ था जिसमे काफी जगह पर पृथ्वीराज चौहान को गुर्जर राजा लिखा गया है

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