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mughal and muharram in India भारत मे मुगल और मुहर्रम

Mughal and Muharram in India

मुगल और मुहर्रम का इतिहास history of mughal and murram

वैसे तो हर कौम और नस्ल को स्वीकार कर चुका हमारा मुल्क भारत अपने इतिहास और संस्कृती के लिए दुनिया मे प्रथम स्थान पर है

इसके अतिरिक्त भी यहाँ मनाये जाने वाले हर त्यौहार से एक इतिहास जुडा हुआ है, जैसे काली पूजा का इतिहास बंगाल से जुडा है, गणेश पंडाल और गणेश पूजा का उत्सव महाराष्ट्र से जुडा हुआ है

बेसे ही हर समय के दौरान भारत मे हर तरह की परम्परा रही है मुस्लमानो मे मनाये जाने वाले पावन पर्व उर्श की बात कर रहे हैँ, मुग़लो के पूर्वज ना तो मुस्लिम थे ना ही बौद्ध थे बल्कि कबीलाई देवता की पूजा करते थे

लेकिन जिस वक़्त तैमूर लँग भारत पर आक्रमण करने आये तो वह मुस्लिम बन गया था उसके बाद मुग़लों की नस्ल ने भारत मे पैर जमा लिये उसके दो सो साल के अंतराल मे मुग़लो ने भारत की सरहदों पर अपने राज्य स्थापित कर लिए और लूट मार कर के अपने गुजर बसर करने लगे थे

गुजरे कुछ दिनों मे भारत पर मुग़ल वंश की पहली सत्ता स्थापित हुयी जिसका संस्थापक जहीरुद्दीन बाबर था बाबर ने बेहद चतुर, होसियार, योद्धा राजा था बाबर की जीवनी मे कहीं भी मुहर्रम का जिक्र नही आता है ऐसा लगता है की पूरे ग्रंथ मे वह खुद को युद्ध और राज्य स्थापना के लिए ही सुपुर्द कर चुका हो मेरा तो यही मत है की “पहले मुगल बादशाह ने मुहर्रम के बारें में लगभग ना के बराबर ही लिखा, क्योंकि उनकी हुकूमत हिंदुस्तान की सरज़मीं पर सिर्फ 4 साल रही, और इन 4 सालों मे लगभग हर साल उन्होंने युद्ध किया विजय की सैना को बढ़ाया फिर अगले युद्ध की तैयारी की और इस पूरे समय में वो सिर्फ अपनी हासिल सल्तनत को और मज़बूत करने में मशरूफ रहते थे” इसके हिसाब से हम यह मान सकते हैँ की बाबर ने भारत मे आकर कहीं से कहीं भी उर्श ये मोहर्रम को चालू नहीं किया

मुहर्रम मे शिया पूरी रात दस दिनों की अवधि के लिए एक बड़ा शोर करते हैं; पुरुष अपनी पत्नियों से अलग सोते हैं, और दिन मे उपवास रखते हैं स्त्रियाँ हुसैन की याद मे विलाप-गीत गाती हैं, और विलाप करती हैं। नगर की मुख्य सड़कों पर पुरुष दो ताबूत बनाते हैं जो कागज़ और चमकीले होते हैँ और उनको यथासंभव समृद्ध रूप से सजाते हैं, शाम को उन्हें कई रोशनी और बड़ी भीड़ के साथ शहर मे घुमाया जाता है शोक और शोर के साथ या हुसैन या हसन बोलते हुए शहर मे घुमाते हैँ। मुख्य उत्सव आखिरी रात को होता है, जिसमे ऐसा लगता है कि बड़े शोक से ऐसा लगता है जैसा कि फिरौन के हठ के समय में भगवान ने पूरे देश को त्रस्त कर दिया था, जब एक ही दिन में सभी फिरौन मारे गए थे। चिल्लाहट दिन की पहली तिमाही तक चलती है; ताबूतों को नदी के किनारे ले आते हैँ और नदी मे सम्मान के साथ बहाया जाता है या दफन कर दिया जाता है

बाबर के बाद दिल्ली की गद्दी पर कुछ दिन के लिए हुमायूँ ने साशन किया जब कुछ ही समय के बाद हुमायूँ शेरशाह सूरी से हारकर सब कुछ गँवाने के बाद सफविद शासक शाह तमस्प से मदद माँगने पहुँचे और शाह तमस्प शिया थे।

शाह तमस्प ने अपनी बड़ी फौज हुमायूँ के साथ भेजी, इस सफविद फौज में तकरीबन सारे शिया थे। जंग जीतने और हिंदुस्तान वापस फतह करने के बाद शाह के सिपाही वहीं आबाद हो गए। इस जंग के जितने के बाद उन जंगियों को इनाम के रूप मे जमीन के पट्टे भी दान किये थे हुमायूँ ने मुहर्रम के दौरान ताजिया के लिए इमाम चौकों के लिए कस्बों और गांवों में जमीनें भी दी जिसका जिक्र समकालीन ग्रन्थ और ऐतिहासिक श्रोतों मे मौजूद मिलता है । उनके दौर में ‘मारीक’ (मैदान ए जंग) नाम से मातमी मजलिस काफी लोकप्रिय हो गई थी। इन मजलिसों ने इमाम हुसैन से रिलेटेड कुरान की आयतें पढ़ी थी और उनको याद कर के एक शानदार जश्न मनाया था जो एक याद के रूप मे अब तक इतिहास मे दर्ज है!!

अकबर को अपने दौर का या ये कहूं मुग़ल काल का सबसे कुशल राजा माना जाता है तो ये कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी जिस समझदारी से अकबर ने हिंदु मुस्लिम एकता को ध्यान मे रख कर दीन ऐ इलाही धर्म और हिंदु मुस्लिम जैन ईसाई सिख आदि सभी के धार्मिक त्यौहारों का विशेष महत्व दिया गया था, उनके दौर में मुहर्रम की एक बेहतरीन तफ्सील फादर मोनसेरेट (Father Monserrate) द्वारा इतिहास मे दर्ज की गयी थी । मोनसेरेट ने नारवाड़ में मुहर्रम को देखा और अपने ग्रन्थ मे लिखा “मुसलमान मुहर्रम के दौरान नौ रोज़े रखते हैं, और सिर्फ दाल खाते हैं, और उन दिनों एक बुलंद चबूतरे पर से इमाम हसन रदिअल्लाहु तआला अन्हु और इमाम हुसैन रदिअल्लाहु तआला अन्हु की दास्ताँ सुनाते और उनके अल्फाज़ो ने लोगों की आँखों में आँसू बुला दिया। आखिरी दिन लोग राखों पर कूदते छाती को जोर जोर से पीट ते लहू निकालते छाती का कुछ लोग नुकीली धारदार चाक़ू नुमा औजार को लोहे की चैन से कस कर बांद लेते और अपनी छाती और पीठ पर जोर जोर से मारते और तब तक मारते जब तक खुद को हुसैन साहब की याद करते करते आंसू और लहू दोनों निकालते थे बड़े जोर जोर से हसन-हुसैन चिल्लाते”

जहाँगीर ने मुहर्रम पर न तो पाबंदियां लगाई और न ही बढ़ावा दिया। जबकि नूरजहां शिया (इमामिया)परिवार से थी। शाहजहाँ के दौर जिसको स्वर्ण काल भी कहा जाता है, उस दौर में मुहर्रम एक कम अहम मामला बन गया।
हालांकि औरंगजेब ने मुहर्रम पर पाबंदी लगाने की कभी सोची ही नहीं लेकिन परिस्थितियों की वजह से मजबूरन उन्हें मुहर्रम पर प्रतिबंध लगाना पड़ा क्योंकि मुहर्रम के दौरान दंगे, और संपत्ति का सत्यानाश और तबाही इतनी बढ़ गई कि औरंगजेब को मजबूरन जुलूसों पर प्रतिबंध लगाना पड़ा, इसका सबसे बड़ा उदाहरण बुरहानपुर है जहा मुहर्रम पर 50 की मौत और 100 बुरी तरह से घायल हो गए थे, और गोलकोंडा में भी दंगे भड़कते रहते थे।

शाहे वक्त आलमगीर बादशाह औरंगजेब और मुहर्रम पर पाबंदी लगाने की कोशिस:-

मुहर्रम को धर्मिक शान्ति और दंगो की वज़ह से जहांगीर ने बंध कराया था उसी शान्ति बहाली के लिए बादशाह औरंगजेब ने इस त्योहार को बंद कराने के लिये एक शाही फरमान जारी किया था फरमान की हुक्मउदूली हजरत शाह वली कादरी के बेटे ने कर दिया। तवारीख गवाह है कि शाह वली कादरी की शख्सियत इतनी ऊंची थी कि उसके आगे आलमगीर औरंगजेब को झुकना पड़ा। दरगाह शाह वली कादरी में मौजूद सदियों पुराने हाथ से लिखे दस्तावेज इस बात को साबित करते हैँ, जिनके मुताबिक हिजरी 1069 में हजरत शाह नजर मोहम्मद कादरी के पास बादशाह औरंगजेब का फरमान आया था की आप मोहर्रम मनाने का काम बंद कर दें। औरंगजेब के लिखे फरमान में लिखा था कि मैंने हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्सों में मोहर्रम बंद करा दिया है। आप भी उस पर पाबंदी लगायें। फरमान पढ़ते ही शाह नजर मोहम्मद आगबबूला हो गये तथा उन्होंने एहतजा खत द्वारा बादशाह को स्पष्ट जबाब दिया कि मैं मोहर्रम पर किसी भी कीमत पर पाबंदी नहीं लगाऊंगा। पहले की तरह ही मे मोहर्रम को मनाऊ गा और मनाता रहूँगा जैसे मनाया जाता रहा है । कुछ समय के बाद बादशाह का एक माफीनामा शाह साहब को मिला। उसमें औरंगजेब ने लिखा था कि हिन्दुस्तान मे मोहर्रम पर पाबंदी लगा कर मैं काफी खुश था। उस दौरान मोहर्रम की नवीं तारीख को पाबंदी के कारण दिल्ली में मोहर्रम का कोई जुलूस नहीं निकला न ही इमामबाड़ों का फाटक ही खुला। नौवीं मोहर्रम की रात में मैं अपने महल की छत पर सोया था अचानक से मेरे कानों में या हुसैन, या हुसैन की गूंज आने लगी। मेरी आंखे खुल गयीं, मैं परेशान हो गया। या हुसैन की आवाज नजदीक आती चली गयी। मैं परेशान हुआ कि मेरे हुक्म के बावजूद दिल्ली में मोहर्रम मना कौन रहा है । चारों तरफ देखा और मुझे महसूस हुआ कि कोई इंसानों की आवाज नहीं है बल्कि मेरे पाबंदी के बाद फरिश्ते हुसैन का गम मनाते हुए उनका ताबूत अपने कंधों पर उठाये रात के सन्नाटे में मेरे महल के ऊपर से हुसैन की सदा लगाते गुजर रहे है। मैंने अपनी खुली आंखों से यह मंजर देखा और सिहर गया। अपने एलान पर शर्मिदा हुआ। खत में लिखा था कि शाह नजर साहब मैं अपने फरमान पर शर्मिदा हूं। आप अपनी दरगाह में पहले के शान शौकत के साथ मोहर्रम मनाते रहें जिसकी बाद से औरंगजेब ने सम्पूर्ण भारत मे मुहरर्म को का उर्श चालू करा दिया था

आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर ने अहले बैत के लिए बड़ी अकीदत का मुज़ाहिरा किया। वह हज़रत अब्बास की याद में सक्का पहना करते और हज़रत कासिम को खिराज ए अकीदत पेश करने के लिए फकीरों जैसा लिबास पहनते थे।

हालांकि बाद के मुगल बादशाहों के दौर में मुहर्रम ने अपनी खोई हुई पहचान हासिल की, और मुहम्मद शाह जैसे बादशाहों के दौर में मुहर्रम की रस्में जोश खरोश के साथ पूरी होती, शौक सभाओ का आयोजन होता जंग ऐ आज़ादी के बाद से मुहरर्म का जश्न काफी मात्रा मे बढ़ गया है और बेहद मनोहर लगता है जिसको आज के जमाने मे उपयोग मे लाया जा रहा है

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