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गुर्जर देश यानी गुर्जरो का निवास स्थान

गुर्जर देश –

गुर्जरत्रा के शाब्दिक मूल बदल कर गुर्जर देश हो गया और जिसमे सम्पूर्ण गुजरात राजिस्थान आता था गुजरात का यह नाम उस पर गुर्जर जाती के प्रभाव की वजह से आया हे इतिहास में हम सब जानते हैं की कुषाण वंश का गुर्जरदेश पर एक लम्ब्बे समय तक शासन रहा था जिसके बाद उस पर उनके सामंत ,मैत्रक और भट्टारक आये जो सामन्य रूप से आज बटार गोत्र से संबंधित रखते हैं और हुन वंश के मिहिर गुल हूँन और तोरमाण भी गुजरात राजस्थान पर शासन कर चुके हैं,भड़ोच के दद्दा वंश अपने आप को महाभारत प्रसिद्ध दानवीर कर्ण का वंशज मानते है उन्हों मे नृप वंशी साखा का शासन काल भी काफी लम्बे समय तक रहता हे निम्न दिए गए सभी वंश ने एक श्रेणी नुमा ईस्वी के पहले से ही गुजरात पर अपना अधिकार कर लिया था,हर्ष वर्धन (606-647 ई.) के दरबारी कवि बाणभट्ट ने हर्ष-चरित नामक ग्रन्थ में हर्ष के पिता प्रभाकरवर्धन का गुर्जरों के राजा के साथ संघर्ष का ज़िक्र किया हैं। संभवतः उसका संघर्ष गुर्जरों के साथ हुआ था| अतः गुर्जर छठी शताब्दी के अंत तक गुर्जर देश (आधुनिक राजस्थान) में स्थापित हो चुके थे। हेन सांग ने 641 ई. में सी-यू-की नामक पुस्तक में गुर्जर देश का वर्णन किया हैं। हेन सांग ने मालवा के बाद ओचलि, कच्छ, वलभी, आनंदपुर, सुराष्ट्र और गुर्जर देश का वर्णन किया हैं भीनमाल जो गुर्जर वंश की प्राचीन राजधानी रहा हे  उस पर कुषाण वंश राज शाशन एक लम्बे समय से रहा हे भीनमाल के  इतिहास से  गुर्जरों का नाता कुषाण सम्राट कनिष्क से जोड़ता हैं। प्राचीन भीनमाल नगर में सूर्य देवता के प्रसिद्ध जगस्वामी मन्दिर का निर्माण काश्मीर के राजा कनक (सम्राट कनिष्क) ने कराया था। मारवाड़ एवं उत्तरी गुजरात कनिष्क के साम्राज्य का हिस्सा रहे थे। भीनमाल के जगस्वामी मन्दिर के अतिरिक्त कनिष्क ने वहाँ ‘करडा’नामक झील का निर्माण भी कराया था। भीनमाल से सात कोस पूर्व ने कनकावती नामक नगर बसाने का श्रेय भी कनिष्क को दिया जाता है। कहते है कि भिनमाल के वर्तमान निवासी देवड़ा/देवरा लोग एवं श्रीमाली ब्राहमण, कनक के साथ ही काश्मीर से आए थे। देवड़ा/देवरा, लोगों का यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि उन्होंने जगस्वामी सूर्य मन्दिर बनाया था। इसके साथ ही एक श्रेणी बद्ध कर्म में गुर्जर देश के एक हिस्से पर नविन  राजवंश की नीव पड़ती हे जिसको चाप वंशी बोलते हैं भीनमाल के रहने वाले ज्योत्षी ब्रह्मगुप्त ने शक संवत 550 (628 ई.) में अर्थात हेन सांग के वहां आने के 13 वर्ष पूर्व ब्रह्मस्फुट नामक ग्रन्थ लिखा जिसमे उसने वहाँ के राजा का नाम गुर्जर सम्राट व्याघ्रमुख चपराना और उसके वंश का नाम चप (चपराना, चापोत्कट, चावडा) बताया हैं| हेन सांग के समय भीनमाल का राजा व्याघ्रमुख अथवा उसका पुत्र रहा होगा।
गुर्जर देश में अपनी सत्ता का एक लम्मा अंतराल कायम करने के बाद गुर्जर देश से गुर्जर इधर उधर राज्य की सीमा और स्थायी निवास के लिये जाने लगे जिसमे  वातापी के चालुक्य भी शामिल थे वातापी के चालुक्य का क्या संबंध हे लेकिन इतिहासकार उनको गुर्जर वंश से मान्ते हैं ,तथा बल्लभी के बटार और मेटरक वंश को भी अधिकतर गुर्जर मानते हैं जिसमे  भगवान जी लाल इंद्र के अनुसार वल्लभी के मैत्रक भी गुर्जर थे वललभी पर गुर्जर राजवंश ने कुषाण काल के पतन के बाद से ही राज किया हे छठी शताब्दी के अंत तक चालुक्यो ने दक्कन में वातापी राज्य की स्थापना कर ली थी| होर्नले के अनुसार वो हूण गुर्जर समूह के थे जिसको गुर्जर माना गया हे जिसके बाद स्पस्ट इतिहास में गुजर देश पर गुर्जर प्रतिहार और उनके सामंतो  राज किया मूलराज सोलंकी चालुक्य वंश का प्रथम संस्थापक था जिसने  नव गुर्जर देश में रखी और सत्ता को लम्ब्बे समय तक कायम किया  वी. ए. स्मिथ चालुक्यो को गुर्जर मानते हैं| जिसका कुमारपाल एक वीर प्रतापी राजा था जिसने गुजरात को गुर्जर देश नाम की ख्याति प्राप्त की  इतिहासकारों  अनुसार इतिहास में छोटे छोटे टुकड़ों में फैला गुर्जर इतिहास को अगर हम एक साथ बना का देखें तो गुर्जर देश पर ईस्वी प्रथम से गुर्जर वंश की किसी न किसी साखा ने राज किया हे

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