educational blog

History of gurgar partihar rajwansh coinsHistory of gurgar partihar rajwansh coins

गुर्जर प्रतिहार राजवंश के सिक्कों का इतिहास

गुर्जर प्रतिहार राजाओं के द्वारा चलाये गए सिक्कों को उस काल में ग्रीक भाषा के द्राम के नाम से जाना जाता था अभिलेखों में मिले जानकारी के अनुसार जिसमें कामा ,अहार, सियाडोनि के अभिलेखों के अनुसार गुर्जर प्रतिहार काल में मिहिर भोज के सिक्कों का नाम श्रीमदआदिवराह द्राम के जान से जाना जाता था मिहिर भोज के समय सिक्कों की माप के अनुसार
ग्रीक- सासानी सिक्के उस समय 66 ग्रेन तथा गुर्जर प्रतिहार कालीन सिक्के माप में 65 ग्रेन के थे जो काफी उत्तम दर्जे के थे इनके राज्य सीमाओं में और उस से बाहर असंख्य सिक्के प्राप्त हुए हैं

सेसानीयन सिक्के – मारवाड़ से प्राप्त हुए गुर्जर प्रतिहार वंश के सिक्के मुख्य रूप से ससेनियन सिक्के के रूप में माने जाते हैं यह सिक्के हूँन वंश के सिक्कों के समान माने जाते हैं जिनको मिहिर गुल आदि ने चलाया उन्ही सिक्कों की परम्परा को धारण कर गुर्जर प्रतिहार वंश के प्रारम्भिक सिक्कों के चलन में आते हैं मिहिर भोज की रजत मुद्रा उसी का अनुसरण करती हे

ग्वालियर ,मालवा ,मारवाड,बिहार ,भोजपुर ओडिशा ,दिल्ली ,राजिस्थान ,गुजरात ,गंगा घाटी तथा नर्मदा घाटी और पंजाब तकल काफी चलन में मिलते हैं जिनके अवशेष आज भी मिलते हैं यह क्षेत्र पहले से भी गुर्जर जाती के बहुल इलाके के रूप मे पहचान प्राप्त कर चुका था

गधेया सिक्के – गधैया सिक्के का चलन गुर्जर प्रतिहार वंश के स्थापना के २०० साल बाद चलन में आते हैं जिनका विषेस स्थान राजिस्थान और मालवा गुजरात आता हे यह सिक्के छोटे मगर मोटे थे जिनका प्रयोग व्यापार के लिये
भी उपयोग मे लाये जाते रहे हैँ

श्री मद आदिवराह -यह सिक्कों का चलन गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज ने किया था यह सिक्के सम्भवतः समस्त शत्रु दमन के बाद चलन में लाये गए होंगे क्यों की कन्नौज और भोजपुर तक स्थापित ,राज्य में यह सिक्के बहुत मात्रा में मिलते हैं यह सिक्के चांदी के सिक्के थे इन सिक्कों पर सासानी प्रभाव दिखयी देता हे इनके सिक्कों के अग्रभाग और पुरोभाग पर विष्णु के अवतार की आकृति स्पस्ट अंकित हे तथा जिसपर “मनुष्य के सिर में वराह का सिर,दाहिनी पैर उठाये ,बाये पैर के निचे चक्र हे और वराह को पृथ्वी की रक्छा करते हुए दिखाया गया हे”
जिस पर नागरी लिपि में दो पंक्तियों में “मदादिवराह” लिखा हे

महिपाल देव – महेन्द्रपाल के पुत्र महिपाल के समय के चलाये गए सोने के सिक्के मिलते हैं जो चेदि राजा गांगेयदेव के शैली के सामान माने जाते हैं राखलदास बनर्जी ने लिपि के अनुसार इनको महिपाल देव के सिक्के माना हे

श्री विनायकपाल द्रम -गंगा घाटी मे राज करने वाले विनायकपाल भोज के पुत्र थे जिनका साशन काल ईस्वी सम्वत 931 -943 तक मिलता हे इनके शासन काल में चलाये गए सिक्कों पर “श्री विनायकपाल देव
“नाम मिलता हे इन के सिक्कों को मिहिर भोज के चलाये गए श्रीमद आदिवराह द्रम के सामान माना गया हे 54 रजत /चांदी के सिक्के लखनऊ के सीमावर्ती भू-भाग में मिलते हैं इनकी तौल 72 ग्रेन हे, सन 1327 में लिखी गयी द्रव्य परीक्षा नामक ग्रंथ में “विनायक मुद्रा” और वराह मुद्रा का जिक्र आता हे

एक साम्राज्य के स्वर्ण युग होने की क्या पहचान आँकी जा सकती है
विदेशी व्यापार, विदेशी यात्री, विदेशी छात्र जो गुर्जर प्रतिहार काल मे आते और भारत का अध्ययन कर के भारत की ख्याती को लेके भारत से बाहर जाते

तभी इतिहास कारो ने यह भी लिखा है की भारत मे एक ऐसा राजा भी था जिसकी राज्य मे हर क़ोई सुकून से डर मुक्त जिन्दगी जी सकता था

सन्दर्भ ग्रन्थ :-
1 -प्राचीन मुद्रा( श्रीयुक्त राखलदास बंदोपाध्याय की बंगला पुस्तक का अनुबाद )श्री रामचंद्र वर्मा
2 -भारत दर्पण ग्रंथ माला ग्रन्थ संख्या-2

Related Posts

India GK: कला एवं संस्कृति latest india GK: art and culture

latest india GK: art and culture भारत में कला का अस्तित्व सभ्यता के आरम्भ से ही है।  सेंधव सभ्यता से प्राप्त मृदभांड़ों पर की गई चित्रकारी एवं मृण्मूर्तियां,…

Leave a Reply

Your email address will not be published.

error: Content is protected !!